भारतीय परंपरा एवं वाङ्गमय में हनुमान एक अद्भुत व्यक्तित्व हैं, जिसका उदाहरण विश्व इतिहास में शायद ही कोई दूसरा हो। यूँ तो हनुमान सेवा -भाव के अप्रतिम उदाहरण माने जाते है, जैसा कि तुलसीदास ने लिखा है-”सबसे सेवक धर्म कठोरा।‘ हनुमान बुद्धि, बल, चातुर्य और विवेक में भी अद्वितीय है। इतना ही नहीं, आधुनिक और वर्तमान संदर्भो में भी वह निहायत ही प्रासंगिक हैं। उनके बुद्धि और विवेक के उदाहरण के लिए वह प्रसंग अन्यन्त महत्वूपर्ण है, जब वह सीता को ढ़ूंढने के लिए लंका में प्रवेश करते है। अचानक उन्हें विभीषण की उप0 का पता चलता है। वह सोचते हैं कि सीता की खोज के संदर्भ में विभीषण से चर्चा की जाए या न की जाए।पर अन्त में वह अपने बुद्धि-विवेक से विभीषण से मिलने का फैसला करते हैं, और इसका कारण वह यह बताते हैं-  
’एहि सन हठ करिहऊ पहचानी, 
साधु ते होई न कारज हानी।‘ 
कहने का मतलब यह कि हनुमान जी तय करते हैं कि विभीषण से किसी भी कीमत पर जान-पहचान बनानी है। यदि इससे मेरा कुछ काम नहीं भी बना तो इसमें कुछ नुकसान होने वाला भी नहीं है। क्योकि साधु, अथवा सज्जन से किसी प्रकार के हानि का आशंका नहीं होती। कहने का आशय यह कि यदि सज्जन व्यक्ति किसी कारणवश किसी की मदद भले न कर पाए पर वह कम-से-कम किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएगा। इस तरह से हनुमान जी को मानवीय प्रवृत्तियों का ही नहीं, बल्कि मनोविज्ञान की भी बेहतर समझ है।  
    जहां तक सेवक-धर्म की बात है, तो वह तो इसके साक्षात स्वरूप है। लेकिन उन्हे यह भी पता है कि सेवक की पहली शर्त यह है कि वह अंहकार रहित हो और मान-अपमान से सर्वथा असम्पकृत  हो। इसी को दृष्टिगत रखते हुए जब मेघनाद नागपाश में बांधकर हनुमान को लंका के राज दरबार में रावण के समक्ष प्रस्तुत करता है। तब हनुमान जी कहते है -  
’मोंहि न कछु बाँधे कई लाजा। 
कीन्ह चहौ निज प्रभु कर काजा।।‘ 
यानी हनुमान जी का कहना है कि मुझे बांधे जाने को लेकर कोई लज्जा या बेइज्जती जैसी कुछ महसूस नहीं हो रहा है, मेरा लक्ष्य तो अपने स्वामी श्री राम जी का कार्य करना मात्र है। वस्तुत: हनुमान जी की उपरोक्त सोंच आधुनिक संदर्भो में निहायत ही प्रासंगिक है। इसका आशय यह है कि हनुमान जी का अपना कोई निजी एजेण्डा तो दूर-दूर तक नहीं है।  
उनका एकमात्र लक्ष्य श्री राम का कार्य सिद्ध करना है। अब जहां तक श्री राम का सवाल है तो यह बताने की कोई जरूरत नही है कि श्री राम कोई एक व्यक्ति मात्र नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों के पर्याय है। जैसा कि प्रसिद्ध संत श्री मुरारी बापू का कहना है -’राम यानी राष्ट्र।‘ कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि श्री राम राष्ट्र के पर्याय है। इस तरह से हनुमान जी का एकमेव लक्ष्य राष्ट्र एवं यह वृहत्तर समाज है। निश्चित रूप से हनुमान जी का उपरोक्त दृष्टिकोण सिर्फ सार्वजनिक जीवन में काम करने वालों के लिए नही, सामाजिक कार्यकर्ताओ के लिए ही नहीं, बल्कि आम जन के लिए भी एक दीप-स्तंभ की भाँति है। क्योकि अक्सर देखने में यह आता है कि आम जन की बात तो अपनी जगह पर है, अपने को सामाजिक कार्यकर्ता कहने वाले भी निजी मान-सम्मान के प्रति बहुत सचेत रहते है। वह ऐसे लोगों से जो समाज-विरोधी कहे जा सकते है या कि उदण्ड किस्म है अथवा दादा एवं गुण्डा किस्म के लोग है। उनसे इसलिए बचते या कटते रहते है कि कहीं उनकी बेइज्जती न हो जाए।  यही वजह है कि ऐसे असामाजिक तत्व अपनी मनमानी ही नहीं करते रहते, समाज जीवन से खिलवाड़ भी करते रहते हैं, क्योकि उनका प्रतिरोध करना तो दूर उन्हे कोई टोंकने का भी साहस नहीं करता। कारण यही आशंका कि इससे मुझे अपमानित होना पड़ेगा, झंझटे एवं परेशानी उठानी पड़ेगी, पर हनुमान जी के अनुसार यदि हमारा लक्ष्य सेवा है, तो ऐसे लोगो ंका प्रतिरोध कहीं-न-कहीं करना पड़ेगा। ऐसे लोगों को टोंकना और रोकना पड़ेगा, भले ही उसका नतीजा जो हो, इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम आत्म-सम्मान शून्य हो जाएं। मतलब सिर्फ इतना है कि निजी जीवन या निजी संबंधों की बात अलग है, पर सामाजिक जीवन या वृहत्तर संदर्भो में निजी मान-सम्मान नहीं, लक्ष्य महत्वपूर्ण है। तभी तो सभी मान-सम्मान को परे रखकर अपमानित होकर भी वह रावण जैसे महाशक्तिशाली का प्रतिरोध कर रहे है। उसे एहसास करा रहे है कि वह गलत कृत्य कर रहा है। मर्यादा का उल्लंघन कर रहा है, जो कि निंदनीय एवं दण्डनीय कृत्य है। संत कबीर भी कुछ इसी अंदाज में कहते है -’परमारथ के कारणें मोंहि न लागै लाज।‘ कहने का आशय यह कि जहां जनहित का प्रश्न है वहां किसी तरह की लाज, शर्म, मान-अपमान का सवाल ही नहीं उठता। गीता के कृष्ण ने ऐसे ही व्यक्ति को योगी  कहा है। सच्चे अर्थो में यदि इस दिशा में आम जन और खास तौर पर सामाजिक कार्यकर्ता जों अपने के समाज का सेवक कहते है, और मानते हैं। इस दिशा में हनुमान जी का अनुकरण कर सके-तो सिर्फ हमारे समाज जीवन की ही नहीं, राष्ट्र-जीवन की बहुत सारी व्याधियों से भी छुटकारा मिल सकता है। पर इसका एक ही रास्ता है, ताकतवर व्यक्ति यदि बुरा है, तो हम उसे बुरा कहने का साहस जुटा सके। पर बिडम्बना यह है कि समाज में बहुत से ऐसे लोग है, जिन्हें सिर्फ अपने सम्मान की चिंता रहती है, और इसके लिए वह ताकतवार लोगों के गलत कार्यो की भी लल्लो-चप्पो करते रहते हैं, जो हमारे समाज जीवन का बड़ा संकट है। हनुमान एक ऐसे व्यक्तित्व है, जो सच्चाई के लिए पूरी तरह समर्पित तो हैं-ही, दूसरी ओर गलत लोगों के विरूद्ध पूरी ताकत से खड़े भी है।